Tuesday, 31 March 2015

भा रही हैं जलेबी - सी बातें आजकल तो कुछ भी सीधा न रहा। रास्ते से लेकर नाश्ते तक सब टेढ़ा होते जा रहा हैं और लोगो की पसंद की तो दाद देनी होगी ,भई !खुजलाने वाला दाद नहीं। " टेढ़ा हैं पर मेरा हैं " यह टैग लाइन जब मेरे बच्चे बोलते हैं तो लगता हैं की मैं भी टेढ़ा बन कर के ऐसा ही छा जाऊ, पर क्या करू मोहतरमा का नया झाड़ू याद आने लगता हैं। अच्छा जी ! कोई बात नहीं " टेढ़ा हो चाहे ,भेड़ा हो " अपना तो अपना ही होता हैं और भाता भी हैं

भा रही हैं जलेबी - सी सीधी बातें 

आजकल तो कुछ भी सीधा न रहा। रास्ते से लेकर नाश्ते तक सब टेढ़ा होते जा रहा हैं और लोगो की पसंद की तो दाद देनी होगी ,भई !खुजलाने वाला दाद नहीं। " टेढ़ा हैं पर मेरा हैं " यह टैग लाइन जब मेरे बच्चे बोलते हैं तो लगता हैं की मैं भी टेढ़ा बन कर के ऐसा ही छा जाऊ, पर क्या करू मोहतरमा का नया झाड़ू याद आने लगता हैं। अच्छा जी ! कोई बात नहीं " टेढ़ा हो चाहे ,भेड़ा हो " अपना तो अपना  ही होता हैं और भाता भी हैं।  बात बड़ी कुरकुरी हैं ,जब कल मेरे  पडोसी चाचा ने  मुझसे कहा - मेरा लाल जलेबी की तरह सीधा हैं।  मेरा तो सर चकराने लगा की अब जलेबी भी सीधी - सीधी बनने लगी और जिसे सीधा बनना  चाहिए ,वो ही अब टेढ़ा होते जा रहा हैं। चलो हटाओ सब बात हम लोगो को तो  बोलने - लिखने की आजादी हैं। लिखने की आजादी से याद आया की मेरे बाज़ार में अभी एक मजनू काका की नई होटल खुली हैं और उसके बोर्ड पर लाल - लाल व  बड़े - बड़े अक्षरों  से लिखा हुआ हैं की यहाँ " शुद्ध - मांसाहारी भोजन " मिलता हैं।  पहले मैं शाकाहारी को ही शुद्ध मानता था पर अब तो यह भी शुद्ध हो गया और अब शाकाहारी वाले भाइयों आप बेफिक्र हो कर इसको खा सकते हैं काहे की शुद्धता तो अब इसमें भी बेशुमार हैं।   मन की बात पर तो अब खुद का काबू रहा नहीं लोग एक दम से तूफानी नहीं सुनामी हो गए हैं ,तभी तो शौचालय से लेकर सचिवालय तक के दीवार टेढ़े - मेढ़े शब्दों से भरे पड़े हैं ,मानो जैसे की पन्नों का आकाल पड़ गया हो। 
             जब क्लास कर के निकलता  हूँ तो शिक्षक की बातें उस सीधी जलेबी की तरह सीधी निकल जाती हैं और आँखों में नए - नए रंगीले शब्द और दीवारों की बाते ही मन में वीराज़ जाती हैं।  गलती इसमें मेरी कुछ भी नहीं हैं यार, मैं भी समाज का कीड़ा हूँ पर अफ़सोस की मैं नाली के कीड़े की तरह सीधा नहीं चल सकता  क्यूंकि यहाँ तो सब के  सब  टेढ़े के दीवाने हैं तो फिर हम क्यों बेगाने बने ? अब तो हाल ऐसा हुआ हैं की " भैस के आगे बीन बजाओं ,आ भैंस देगी दौड़ाई " काहे की कल जब हम प्रेमवा को दीवार पर लिखने से मना किये तो उ बोला - रूको बड़ा आये हो सफ़ेद शर्ट पहन के गाँधी बनने ,आओ शर्ट पर लिख देता हूँ।  अब का कहे भईया ! अगर "उहाँ  नहीं मारते  मति , तो खुद की होती क्षति " , अब इस बात को भी उस बात की तरह ना लीजियेगा  क्यूंकि हम तो टेढ़े रास्ते पर चल कर भी सीधी बात करते हैं।  मैं समुन्दर की तरह मीठा नहीं हूँ पर  शब्दों को पी कर देखिये तृप्ति तो भरपूर मिलेगी।