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| PC- Ravi Ranveera |
होली आने वाला है. चारों तरफ़ बङे - बङे रंग बिरंगे पोस्टर लगे हैं नेताओं के, होली की शुभकामनायें देने के लिए. होली के पहले ही सब कुछ कलरफुल हो गया है तो फिर होली का क्या मजा आयेगा होली के दिन. सारी पार्टियाँ एक महीना पहले से ही होली मिलन समारोह मना रही हैं तो फिर होली वाले दिन क्या बिरह गीत गाएंगे! शायद इसलिए हम होली को होली की तरह नहीं मना पाते हैं क्योंकि त्योहार एक दिन ही भाता है. रोज रोज होने लगे तो उसे त्योहार नहीं कहते हैं. इसलिए अब कोई भी किसी के घर नहीं जाता है क्योंकि हम तो पहले से ही होली का गुलाल लगा चुके हैं. बार बार कौन अपने कपड़े गंदे करेगा क्योंकि सब कुछ तो महंगा हो गया है, सर्फ से लेकर बर्फ तक. बङी मुश्किल से तो छुट्टी मिली है, चलो आराम फरमा लेते हैं आज. और अब क्या मिलना क्योंकि होली मिलन समारोह में तो सबसे मिल ही चुके हैं. यह दुनियाभर की सोच हमें हमारे संस्कृति से दूर कर रही है क्योंकि हम मूल ट्रेक से हटकर कुछ ज्यादा ही एडवांस हो गये हैं. होली का मतलब ही हुआ कि घुल मिल जाना लेकिन हम तो मिल कर ही भूल जा रहे हैं और जिसको ज्यादा लगाव है, वह फेसबुक पर लिख देगा हैप्पी होली और बस मन गई हमारी होली. अरे! होली तो सबसे अच्छा रमुआ मनाता है. घूम घूम कर सबके माथे गाल पर अबीर गुलाल लगायेगा और सब के घर का पुआ पकवान, पकौड़ी पकौड़े व मीट चखेगा. अकेले पुरा गांव के बदले फगुआ गा देता है और जब जोर से गाता है, पुरा जोश में होश लगा के कि सा रा सा रा रा रा रा रा रा रा रा रा रा हो हो सारा रा रा तो मन रम जाता है सब के साथ में. सब लोग तो नहीं लेकिन कुछ लोग तो जरूर ही आ जाते हैं उसका सा रा रा रा रा रा रा का आनंद लेने. तो फिर देर क्या है चलिये सब रम जाते हैं हम भी सा रा रा रा रा के शोर में.
